Saturday, February 4, 2012

एक नयी ग़ज़ल

ख़ुदा से होड़ करने पर तुला है
बशर इस दौर का इक चुटकुला है

समझ आता नहीं किरदार उसका
कभी अक्खड़ कभी वो चुलबुला है

कभी भी जाईए फ़रियाद लेकर
फ़कीरों का हमेशा दर खुला है

जो सुख- दुःख को बराबर तोलती हो
हमारी ज़िन्दगी ऐसी तुला है

परिंदे आज कितने खुश हैं देखो
कई दिन बाद ये मौसम खुला है

कवि दीपक गुप्ता
+91 9811153282
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